युवा और सूबे की राजनीति

युवा और सूबे की राजनीति

युवाओं को साध पाना सबसे बड़ी चुनौती

देश हो या प्रदेश या फिर किसी भी स्तर के चुनाव में युवाओं का प्रभाव हर समय दिखता है। युवाओं के साथ सबसे बड़ा प्लस प्वॉइंट जातिवाद का हावी ना होना माना जाता है, क्योंकि युवा नेताओं के साथ समाज के सभी वर्गों के युवा जुड़े होते हैं।

किसी भी राज्य में जब चुनाव हो रहा होता है तो सामान्य आदमी के लिए उस राज्य के चुनावी माहौल का अंदाजा लगाने के जो मानक होते हैं, वे मुख्यतः यही होते हैं कि किस पार्टी की रैली में कितनी भीड़ जुट रही है, कौन सा मुद्दा किस पर भारी पड़ रहा है और कौन किस दल को अपने साथ जोड़कर जातीय समीकरणों को दुरुस्त कर रहा है? इसमें सबसे ज्यादे भीड़ उसी के साथ रहती है जिसके साथ युवा रहते हैं क्योंकि वह खुद तो आते ही हैं, अपने साथ और भी युवाओं को लेकर आते हैं।
यूपी, पंजाब, उत्तराखंड सहित उन पांच राज्यों में भी सबके लिए यही मानक बने हुए हैं, शनिवार को चुनावी अधिसूचना जारी होते ही सभी दलों ने अपनी लॉबिंग शुरू कर दी। लेकिन बात अगर राजनीतिक दलों के नजरिए से की जाए, खासतौर पर भाजपा और सपा तथा कांग्रेस की तो हर कोई युवाओं को अपने पाले में करने के लिए लालायित दिख रहा है। सूबे में 35 वर्ष तक की आयु वर्ग के लगभग 46 फीसद मतदाता हैं।

युवाओं को अपने पाले में करने की चुनौती अन्य सभी चुनौतियों से बड़ी है क्योंकि युवा कभी भावनाओं में बहकर किसी के साथ खड़े नज़र आते हैं तो कभी परिस्थितियों के अनुरूप किसी के साथ खड़े नज़र आते हैं। “जिस ओर जवानी चलती है, उस ओर जमाना चलता है।” यह कथन पहले से ही युवाओं के शक्ति का एहसास कराता है जो कि यथार्थ है।

वर्तमान समय में युवा निराश एवं हताश हैं और उसकी वजह सरकारी नौकरियों की प्रक्रिया को जल्दी न होना एवं रोजगार के पर्याप्त संसाधन ना मौजूद होना, ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि युवा किस दल की ओर ज्यादा जाते हैं। वैसे वर्तमान हालात में सभी राजनीतिक दलों ने युवाओं पर डोरे डालने शुरू कर दिए हैं। ऐसे में युवा नेता भी विधानसभा चुनाव में अपनी किस्मत आजमाने के लिए लालायित हैं लेकिन कौन दल कितने युवाओं को प्रत्याशी बनाता है यह भविष्य की बात है।

भाजपा के लिए सर्वाधिक अहम हैं विधानसभा चुनाव

भाजपा के लिए चुनौती सबसे बड़ी है क्योंकि इन पांच राज्यों का चुनाव देश के 2024 के चुनाव को प्रभावित करेगा और वर्तमान समय में देश की सत्ता में भाजपा काबिज़ है।
वहीं बात अगर कांग्रेस की बात करें तो कांग्रेस को पाने के लिए सबकुछ है लेकिन खोने के लिए बहुत कम, क्योंकि 2014 की भाजपा की आंधी के बाद कांग्रेस का जो नुकसान हुआ उसकी भरपाई अबतक नहीं हो सकी है लेकिन उनके प्रदर्शन में थोड़ा सुधार जरूर आया है। ऐसे में भाजपा सूबे के चुनावों में अपनी बढ़त को बरकरार रखना चाहेगी तो वहीं कांग्रेस इन राज्यों के माध्यम से दिल्ली दरबार में पुनः दस्तक देना चाहेगी।
पिछले विधानसभा चुनाव के आंकड़ों पर नज़र डालें तो 2017 में लगभग 61 फीसद मतदान हुआ था जिसमें से 39.67 फीसद मतदाताओं ने भाजपा को पसंद किया तो 22.23 फीसद मतदाताओं ने बसपा को, 21.82 फीसद मतदाताओं ने सपा तो वहीं मात्र 6.25 फीसद मतदाताओं ने कांग्रेस को अपना मत दिया था।
पिछले चुनाव से यह चुनाव थोड़े से अलग हैं क्योंकि कोरोना का नया वैरिएंट ओमिक्रोन का भय भी मतदाताओं को बना हुआ है ऐसे में युवा वर्ग ही आगे आकर मतदान फीसद को बढ़ा सकता है।

दिव्येन्दु राय
स्वतंत्र टिप्पणीकार

Divyendu Rai

जिस दिन कुछ बन जाऊँगा, फिर बायोग्राफी में कुछ लिखने की जरूरत ही नहीं रह जाएगी।

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