न्याय का संघर्ष

न्याय का संघर्ष

भारतीय संविधान विश्व के सबसे महान कहे जाने वाले संविधानों में से एक है लेकिन इसी भारतीय संविधान के तहत न्यायपालिका के कुछ फ़ैसले आमजन को न्यायपालिका जाने से रोकते हुए दिखते हैं।

राष्ट्रीय सहारा

एक वाकया बिहार में तीन एकड़ जमीन के मुकदमे का है जिसका फैसला 108 साल बाद आया। न्याय की आस लगाये बैठे वादी की अब चौथी पीढ़ी है जबकि उनके वकील की तीसरी पीढ़ी।

यह तो संयोग अच्छा रहा कि इनकी चार पीढ़ियों ने मुकदमे की पैरवी को जारी रखा अन्यथा न्याय मिल पाता यह कहना थोड़ा अजीबोगरीब सा लगता है।

उक्त मामले की कानूनी लड़ाई 108 साल पहले यानी 1914 में शुरू हुई थी।

आज़ाद पत्र

इस प्रकरण को मैं भी तब जान पाया जब इसे कहीं लिखा हुआ पाया और एक बात गांठ बांध लीजिए कि इतिहास लेखन भी सदा जीतने वालों के साथ न्याय करता है, हारने वालों के साथ नहीं।

हारने वाला योद्धा चाहे जितना भी प्रतापी रहा हो कसीदे तो हमेशा जितने वालों के ही पक्ष में ही गढ़े जाते रहे हैं।

चाहे वो जीत किसी भी तरह हासिल हुआ हो इतिहास ने गुणगान तो उसी का किया है।

बस यही वास्तविकता है जिसे कहा तो नहीं जाता लेकिन व्यवहारिक तौर पर स्वीकार जरूर किया जाता है।

बात 2020 के आसपास की है, पूर्वांचल के गाजीपुर का रहने वाला एक युवा जो गाजियाबाद में रहकर नौकरी कर रहा होता है वह एक दिन रात को लौटकर घर नहीं आया था। काफ़ी खोजबीन हुई लेकिन अन्त में वह हुआ जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी।

उक्त युवा का शव पाया गया। वह लड़का अपने माँ बाप का इकलौता बुढ़ापे का सहारा था, उसकी मौत ने सबको झकझोर कर रख दिया।

माँ का संघर्ष

एक बच्चे को जन्म देने वाली जननी का संघर्ष कितना बड़ा होता है उसे वह माँ ही जानती है जिसने अपने बच्चे को जन्म देने के बाद उसको पालने एवं बेहतर भविष्य देने के लिए खुद को खपा दिया होता है। खुद के दुःख सुख को भूल वह माँ अपने बच्चे के सुख के लिए लाखों दुःखों का अंगीकार करती नज़र आती है।

गाजीपुर के जिस लड़के की अप्राकृतिक मृत्यु हो गई थी उसकी माँ का अपने बच्चे को न्याय दिलाने के लिए जो संघर्ष चल रहा है वह मिशाल है।

सालों से गाजीपुर से नोएडा, गाजियाबाद एवं लखनऊ सैकड़ो बार जाकर हज़ारों लोगों से मिलकर अपने बच्चे के लिए न्याय की गुहार लगाना कोई आसान बात नहीं।

उस माँ ने अपने बेटे की याद में कितनी रातें जगकर काटी होंगी, कितने दिन भूखे काटी होगी यह सिर्फ वह माँ जानती होगी।

कुछ महीनों पहले वह माँ लखनऊ में एक जगह कुछ लोगों के कहने पर न्याय के लिए फरियाद लेकर पहुँची। मैं नहीं जानता था उस माँ को लेकिन जब उसकी व्यथा सुनी तो आँखें भर आईं और उस माँ की आँखें भी अपना दर्द बताते हुए डबडबा गईं थीं।

वहां मौजूद कुछ लोगों के पत्थरदिली का आलम यह था कि वह सबकुछ सुनने के बाद भी उस माँ की मदद करने की बात तो छोड़िए सही व्यक्ति से 10 कदम आगे जाकर मिलवाने की जहमत तक नहीं उठा सके।

बहरहाल मैंने उस माँ को 10 कदम आगे जाकर एक नेता से मिलवाया और उस नेता ने अपने स्तर पर उस माँ की मदद की लेकिन भारतीय कानून व्यवस्था की पेचीदगियों ने मामले को यूं ही उलझाये रखा।

लेकिन उस माँ ने हार नहीं मानी और वह अपने बच्चे को इंसाफ़ दिलाने के लिए लड़ती रही, इस दरम्यान उस माँ से मेरी कई बार मुलाकात हुई।
लेकिन पिछली बार जो हुआ उसने मुझे झकझोर कर रख दिया।

पिछली बार जब वह माँ मिली तो उन्होंने बताया कि केस में जाँच तो हो रही लेकिन स्थानीय अधिकारी रिपोर्ट सबमिट नहीं कर रहा, तथा कई बार जाकर निवेदन करने पर भी मामले को ठण्डे बस्ते में डाल दिया है और अपने लड़के की फ़ोटो दिखाकर रोने सी लगीं।

उनके कहने पर मैंने अपने एक परिचित अधिकारी से बात की एवं उक्त प्रकरण में नियमसंगत मदद करने की गुहार लगाई, इसपर उन्होंने स्थानीय स्तर पर बात करके केस का अपडेट भी बताया। मैंने पूरी बात उस माँ को बताई एवं उनको घर जाने का निवेदन करके उठकर कहीं जाने लगा तो वह माँ मेरे साथ-साथ चलने लगीं और सकुचाते हुए अपने हाथों में कुछ नोटों को मोड़े हुए मुझे देने की कोशिश करने लगीं।

मैंने कहा ‘अरे! चाची यह क्या?’
इसपर उन्होंने भोजपुरी में कहा ‘अरे तू लईका के उम्र क हवा, ल इ चाय पानी क लिहा।’
इसपर मैंने उनसे कहा ‘आप लोग बस आपन आर्शीवाद दिहल जाएं, बाकी केहू क कुछऊ ना चाही।’

यह घटनाक्रम मेरे लिए कोई नया नहीं था, लगभग एक दशक से भी ज्यादा समय से सामाजिक जीवन में हूं जहां अनेकों बार मदद मांगने वाले लोगों ने कुछ देने का प्रयास किया।

लेकिन जब – जब मेरे साथ ऐसा वाकया घटित होता है मैं पूरी रात सो नहीं पाता बल्कि यह सोचते रह जाता हूं कि आखिर ऐसा क्यों हुआ।

उस दिन भी कुछ ऐसे ही हुआ, उस माँ के दुःख तकलीफ को सोचते ही आँखें भर आईं कि उस माँ को कितनी दुःख और तकलीफे उठानी पड़ रही होंगी क्योंकि उन्होंने एक दिन बताया था कि सुहेलदेव एक्सप्रेस से गाजीपुर से लखनऊ आयीं हैं और फिर डायरेक्ट वहीं आ गई थी जहाँ मेरी उनसे मुलाकात हुई थी।

मैं देर शाम अकेले बैठकर यह सोचता रहा कि ऐसा तो किसी के साथ भी हो सकता है ना, तो सबकी माँ को यूं ही न्याय पाने के लिए दर-दर भटकना पड़ेगा ना। भारतीय न्याय प्रणाली में ना जाने कब उस माँ को न्याय मिलेगा लेकिन माँ के संघर्ष के आगे अब सबका संघर्ष बौना नज़र आता है।

Divyendu Rai

जिस दिन कुछ बन जाऊँगा, फिर बायोग्राफी में कुछ लिखने की जरूरत ही नहीं रह जाएगी।

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