नई सरकार नये सामन्त

नई सरकार नये सामन्त

सामंतवाद से हर कोई बाहर आना चाहता था और अब कोई सामंतवाद बचा भी नहीं शिवाय राजनीतिक सामंतवाद के।

देश के राजनीतिक परिदृश्य को उठाकर देखें तो आज़ादी के बाद देश में 80 के दशक तक ना तो क्षेत्रवाद हावी रहा और ना ही जातिवाद। 1952 में देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने जमीदारी प्रथा को तोड़कर जमीनी सामंतवाद को तो खत्म करने की पहल की लेकिन उस दौर में एक अन्य सामंतवाद का जन्म हुआ जिसे राजनीतिक सामंतवाद कहा जा सकता है।

राजनीतिक सामन्तों का जो बोलबाला शुरू हुआ वह वर्तमान समय में काफी प्रभावशाली है और इन सामन्तों के प्रभाव के चलते आमजन का जितना भला होना चाहिए उससे कई गुना ज्यादे नुकसान हो जाता है।

राजनीतिक सामन्त अपनी राजनैतिक ताकत और अपना प्रभाव बढ़ाने के चाह में राजनीतिक सुचिता एवं मर्यादा को किनारे लगाने में एक मिनट का भी देर नहीं करना चाहते। शायद इसी वजह के चलते देश की विधायिका में इतने आपराधिक ज्यादे आपराधिक इतिहास वाले माननीय देश के भविष्य के लिए नियम बना रहे हैं, कोई भी व्यक्ति जब नियम बनाता है तो अपने मुफीद बनाता है ऐसे में जब आपराधिक मामलों में माननीय न्यायालय का चक्कर लगा रहे माननीय नियम बनाएंगे तो ज़ाहिर सी बात है कि अपने अनुकूल ही बनाएंगे।

आपराधिक इतिहास वाले लोग जब राजनीतिक सामन्तों द्वारा राजनीति में स्थापित किये जाते हैं तो वह अपनी खुद की सुरक्षा और अनुकूलता के लिए सभी नियम कानूनों को दरकिनार कर कार्य करते हैं, और राजनीतिक सामन्त अपनी शक्ति में इज़ाफ़ा होते देख आँख मूंद लेना बेहतर समझते हैं।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने कहा है कि कुल 363 सांसद, विधायक आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे हैं। चुनाव सुधारों के लिए काम करने वाले संगठन एडीआर और ‘नेशनल इलेक्शन वाच’ ने 2019 से 2021 तक 542 लोकसभा सदस्यों और 1,953 विधायकों के हलफनामों का विश्लेषण किया है। एडीआर के मुताबिक 2,495 सांसदों, विधायकों में से 363 (15 प्रतिशत) ने घोषणा की है कि उनके खिलाफ कानून में सूचीबद्ध अपराधों के लिए अदालतों के जरिए आरोप तय किए गए हैं। इनमें 296 विधायक और 67 सांसद हैं।

” राजनीतिक सामन्तों और अपराधियों का गठजोड़ देश के साथ-साथ मानवता को कई बार शर्मसार करते नज़र आ जाता है।”

80 के दशक के समापन के साथ ही जिस तीव्र गति से क्षेत्रीय राजनीतिक सामन्तों का राजनीति में प्रभाव बढ़ते गया वैसे ही राजनीति की सूचिता और मर्यादा खत्म होते चली गई। राजशाही में यह प्रथा थी कि राजा का बड़ा बेटा ही राजा बनेगा न की किसी सैनिक अथवा प्रजा का लड़का, वैसे ही हालात काफ़ी हद तक राजनीतिक सामन्तों का है जिनमें उनके बाद उनका कोई रिश्तेदार।

चुनावों के बाद जब सरकार बनती है तो उसी के साथ नई सरकार, नये सामन्त के परिभाषा की शुरुआत हो जाती है। जो सत्ता के करीबी होते हैं वह सामन्ती विचारधारा के पोषक भी नज़र आने लगते हैं और कई दफ़े तो जनता के एवं मानवीय मूल्यों के शोषक बने नज़र आते हैं।
बुरे दिनों में साथ में संघर्ष करने वाले लोगों को एक किनारे कर देना तो सत्ताधीशों की पुरानी आदत रही है क्योंकि जो संघर्षों के साथी होते हैं वह सच्चाई से अवगत कराते हैं जी हुजूरी करने के बजाय और सरकार के सामन्तों को यह रास नहीं आता।

राजनैतिक सामंतवाद का अन्त होना राजनीतिक मूल्यों के रक्षा के लिए आवश्यक है लेकिन फ़िलहाल ऐसा कुछ दूर-दूर तक होता नज़र नहीं आ रहा।

Divyendu Rai

जिस दिन कुछ बन जाऊँगा, फिर बायोग्राफी में कुछ लिखने की जरूरत ही नहीं रह जाएगी।

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This Post Has One Comment

  1. Ashutosh

    बढ़िया लेख