काशीपुत्र थे रघुनाथ सिंह

जननेता डॉ० रघुनाथ सिंह

भारत को यूं ही नहीं महान देश कहा जाता बल्कि इस महानता के पीछे बहुतेरों बलिदान और त्याग की गाथाएँ हैं जो आम जनमानस से छुप गईं हैं। आजकल जहां राजनीति को पैसा कमाने का और सम्मान अथवा पॉवर पाने का शॉर्टकट समझा जाने लगा है वहीं इस राजनीति को अनेकों माँ भारती के लाल सेवा समझते थे और देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर तक करने से पीछे नहीं हटते थे।

आज हम बात कर रहे हैं काशी के लाल, काशी की शान रहे डॉ० रघुनाथ सिंह की।

महादेव की नगरी काशी जन नायकों की धरती रही है। यहां से निकले राजनेताओं की सादगी, सहजता और राष्ट्रसेवा इस दौर के जनप्रतिनिधियों, नेताओं के लिए सीख है। आजादी के बाद वाराणसी के प्रथम सांसद रहे डॉ० रघुनाथ सिंह के राजनीतिक आदर्श और मूल्यपरक सिद्धांत आज भी मिसाल के तौर पर याद किए जाते हैं। शिपिंग कॉरपोरेशन के चेरयमैन पद पर रहते हुए भी वह रेल की जनरल बोगी में ही यात्रा करते थे। पं० जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, चौधरी चरण सिंह सरीखे राजनेताओं के करीबी रहे बाबू रघुनाथ सिंह ने कभी सरकारी सुविधा स्वीकार नहीं की। अपनी जमीन पर नमक सत्याग्रह आरंभ करने के आरोप में ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर जब चौकाघाट जेल में बंद किया तब उन्होंने बैरक से ही जेल सुधार आंदोलन छेड़ दिया था।

औरंगाबाद हाउस के पीछे गली में बाबू रघुनाथ सिंह का मकान अब भी उसी हाल में है, जहां कभी नेहरू, इंदिरा, चरण सिंह जैसे राजनेताओं का आना-जाना रहता था। 1921 में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हिंदू विश्वविद्यालय में तत्कालीन प्रिंस ऑफ वेल्स के आगमन के बहिष्कार के आरोप में पहली बार महज 11 वर्ष की उम्र में गिरफ्तार कर जेल भेजे गए रघुनाथ सिंह 1952 के आम चुनाव में वाराणसी के प्रथम सांसद चुने गए। वे लगातार तीन बार 1952, 1957, 1962 में वाराणसी (बनारस) सीट से सांसद चुने गए। बतौर सांसद, उन्हें अपनी सादगी और कर्मठता के लिए जाना जाता था।

काशीवासी बताते हैं कि एक बार पं० जवाहरलाल नेहरू बेनियाबाग में सभा करने पहुंचे थे। तब उन्होंने मंच से रघुनाथ सिंह को केंद्र सरकार में मंत्री बनाने की इच्छा जताई थी। वह तीन बार सांसद चुने गए और तीनों बार उन्हें मंत्री पद देने की पेशकश हुई, लेकिन उन्होंने ठुकरा दिया। वह कहते थे कि मंत्री बनना सरकारी नौकरी करने जैसा है। वह जनता के बीच रहकर उनकी भावनाओं को जान-समझकर उनकी सेवा करना चाहते थे। उन्होंने कभी सरकारी सुविधाओं का इस्तेमाल नहीं किया।

उनका कहना था कि देश का पैसा देश की तरक्की के काम आए। वह गरमी के दिनों में भी अपने कक्ष का पंखा बंद करा देते थे। उनके छोटे भाई अकबाल सिंह के पुत्र सतीश सिंह बताते हैं कि गर्मी के दिनों में भी हम लोग उनके रहते पंखा नहीं चला पाते थे। कहते थे ऊर्जा को देश के हित में बचाना सीखो। जो बिजली हम बचाएंगे, वह दूसरों के काम आएगी। वह हमेशा दूसरों की मदद करने पर जोर देते थे।

खेवली भतसार गांव के निवासी डॉ. रघुनाथ सिंह राजनीति में जनसेवा के प्रति त्याग की प्रतिमूर्ति थे। हमेशा ट्रेन की जनरल बोगी में ही सफर करते थे। रेलवे स्टेशन पर उन्हें लेने सरकारी कार पहुंचती थी तो वह लौटा देते और रिक्शे पर बैठकर औरंगाबाद स्थित अपने घर पहुंचते थे। 1968 में जब वह हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड के चेयरमैन बने, तब सरकार से सिर्फ एक रुपये वेतन के रूप में लेना स्वीकार किया था। 1977 में शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के भी चेयरमैन की कुर्सी संभालने के दौरान उन्होंने सिर्फ एक रुपये ही वेतन लिया।

1962 वाराणसी लोकसभा चुनाव के यह नतीजे उनकी लोकप्रियता को दर्शाने के लिए पर्याप्त लगते हैं|

श्री रघुनाथ सिंह –              1,04,682

श्री रघुवीर –                     58,715

श्री सत्यनारायण सिंह –       58,285

श्री लालता प्रसाद –            31,637

श्री कन्हैया लाल गुप्ता –       4,816

श्री बालचंद –                   3,522

विस्तृत परिचय

डॉ० रघुनाथ सिंह का जन्म 1910 में वाराणसी ज़िले के खेवली भतसार गाँव में एक भूमिहार ब्राह्मण परिवार में हुआ था| वह श्री बटुकनाथ सिंह और श्रीमती लीलावती देवी के पुत्र थे। उन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से कला स्नातक और एलएलबी की पढ़ाई की थी वर्ष 1926 में बनारस से पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने भारतीय सर्वोच्च न्यायालय में बतौर एडवोकेट भी काम किया था। वर्ष 1920 में उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ली थी। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, 1921 में महज 11 वर्ष की आयु में उन्होने 34 दिनों तक जेल में सज़ा भी काटी थी, इसके अलावा उहें 1926, 1930 और 1942 में भी जेल में बन्द किया गया था। बहरहाल, स्वतंत्रता सेनानी होने के बावजूद उन्होंने कभी पेंशन नहीं ली। 1938 से 1941 तक वे बनारस के नगर कांग्रेस समिति के सचिव रहे तथा 1946 से 1949 तक उसके अध्यक्ष रहे। अगस्त 1942 के अत्याचार जाँच समिति के सचिव भी रहे|

निजी जीवन में वे कर्मठ एवं अत्यंत ही सादगी पसंद व्यक्ति थे। महत्वपूर्ण भूमिका में होते हुए भी, कभी भी सरकारी साधनों व सुविधाओं का उपयोग पसंद नहीं करते थे। उन्हें निजी जीवन में, योगाभ्यास में अत्यंत दिलचस्पी थी, तथा राजनीति शास्त्र, नौवहन, रक्षानीति, कानून, तथा परिवहन नीति जैसे विषयों में विशेष रुचि रखते थे। साथ ही उन्हें ऐतिहासिक व धार्मिक स्थलों की यात्रा करना भी पसंद था।

23 अप्रैल 1992 को 92 वर्ष की आयु में, वाराणसी में उनका निधन हो गया। उनके दत्तक पुत्र संतोष सिंह को उन्होने गोद लिया था उनका कोई पुत्र नही था।

राजनैतिक जीवन

राजनैतिक जीवन में, उन्हें अपनी सादगी और त्यागवान व्यक्तित्व के लिए जाना जाता था। वे मात्र एक रुपए के वेतन पर काम करते थे, तथा अपने सांसदीय कार्यों के लिए दी गये सरकारी गाड़ी का भी इस्तेमाल नहीं करते थे। डॉ. रघुनाथ सिंह 1968 में एक रुपए वेतन पर ही जिंक लिमिटेड के चेयरमैन बने, तथा 1977 में शिपिंग कॉरपोरेशन के भी चेयरमैन रहे। वहां भी वे केवल एक रुपए वेतन ही लेते थे। उनका मानना था कि, “बाकी पैसा देश के विकास में काम आएगा।” उनके बारे में विख्यात है कि वे हमेशा रिक्शे से ही यातायात किया करते थे, तथा इतने महत्वपूर्ण ओहदे और शिपिंग कॉरपोरेशन के चेयरमैन जैसे उच्च पद पर रहते हुए भी वे रेल की जनरल बोगी में ही यात्रा करते थे।

अपने राजनीतिक जीवन में उन्होंने कई महत्वपूर्ण पद और भूमिकाएं निभाई। स्वतंत्रता पश्चात वे अंत तक कांग्रेस पार्टी से जुड़े रहे व अनेक महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई। 1946 में भारत सरकार द्वारा नियुक्त नेपाल प्रतिनिधिमंडल के साथ गए। वर्ष 1952 में वे रिसेप्शन कमेटी, उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमिटी के राजनीतिक सम्मेलन वाराणसी के अध्यक्ष रहे। इसके अलावा उन्होंने नेपाल क्रांति और नेपाल कांग्रेस आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी। वे बहुत लंबे समय तक उत्तर प्रदेश और अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के सदस्य रहे थे। इन सब के अलावा, वे अखिल भारतीय रेलवे टाइपिस्ट एसोसिएशन तथा ऑल इंडिया इंजीनियरिंग ग्रेड III टेलीफोन नियोक्ता एसोसिएशन के अध्यक्ष रहे, तथा भोजपुरी समाज के कार्यकारी अध्यक्ष की भी उन्होंने भूमिका निभाई और प्रताप जयंती तथा नागिक मंडल के वे संस्थापक थे। वे राष्ट्रीय नौवहन बोर्ड, अखिल भारतीय हैंडलूम बोर्ड, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की अदालत के सदस्य रहे। वे 10 साल तक संसद में कांग्रेस पार्टी कश्मीर अध्ययन समूह और संसद में कांग्रेस पार्टी परिवहन समिति के संयोजक तथा 5 साल तक उत्तर प्रदेश राज्य समिति, कांग्रेस पार्टी के संसदीय सचिव रहे।

साहित्यिक रुचि

उन्होंने अपनी जीवन में अनेक पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें से अधिकांश हिंदी में, तथा एक अंग्रेजी में भी है|

अंग्रेज़ी: टुवर्ड्स फ़्रीडम (Towards Freedom)

हिंदी: धर्म निरपेक्ष राज्य, आधुनिक राजनीति के क ख ग, एक कोना चौड़ा कहाँ, संस्कार, भिखरिणी, इन्द्रजाल में फासिज़्म, जागृत नेपाल, विश्व के धर्मप्रवर्तक, सर्वधर्म समभाव, लावारिस, दक्षिण पर्व-एशिया, आर्यन और ऑस्ट्रेलिया।

डॉ० रघुनाथ सिंह जी जैसे महापुरुष सच्चे मायनों में जननेता थे और वर्तमान समय के नेताओं को सीख लेने की जरूरत है रघुनाथ बाबू से|

दिव्येन्दु राय

Divyendu Rai

जिस दिन कुछ बन जाऊँगा, फिर बायोग्राफी में कुछ लिखने की जरूरत ही नहीं रह जाएगी।

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